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हाशिया
कविता
जेहि लगि सजन सनेहिया, छुट घर बार
रहीम
बरवै · लगभग २ मिनट
परकीया-खण्डिता
जेहि लगि सजन सनेहिया, छुट घर बार।
अपने होत पिअरवा, साँच परार॥४७॥
॥
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जेहि लगि कीन बिरोगवा, ननद जेठानि
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जै हौं कान्ह नेवतवा, भो दुख दून
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रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीजै नहीं
रहीम
कविता
रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीजै नहीं
रहीम
२ मिनट का पाठ
सेत कुसुम के हरवा, भूषन सेत
रहीम
कविता
सेत कुसुम के हरवा, भूषन सेत
रहीम
२ मिनट का पाठ
सुन्दर चतुर धनिकवा, कुल को ऊँच
रहीम
कविता
सुन्दर चतुर धनिकवा, कुल को ऊँच
रहीम
२ मिनट का पाठ