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हाशिया
कविता
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहै
रहीम
सोरठा · लगभग २ मिनट
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहै।
हेरनहार हिरान, रहिमन आपुहि आपु मैं॥७॥
॥
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पलटि चली मुसकाइ, द्युति रहीम उपजाइ अति
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रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं
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सखिअन कीन सिंगरवा, रचि बहु भाँति
रहीम
कविता
सखिअन कीन सिंगरवा, रचि बहु भाँति
रहीम
२ मिनट का पाठ
सीस नवाइ नबेलिया, निचवा जोइ
रहीम
कविता
सीस नवाइ नबेलिया, निचवा जोइ
रहीम
२ मिनट का पाठ
रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं
रहीम
कविता
रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं
रहीम
२ मिनट का पाठ