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एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंध चरावै गाई

पद · लगभग २ मिनट
एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंध चरावै गाई॥ टेक॥पहले पूत पीछे भइ माँई, चेला कै गुरु लागै पाई।जल की मछली तरवर ब्याई, पकरि बिलाई मुरगै खाई॥बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूँ लै गई बिलाई॥तलिकर साषा ऊपरि करि मूल बहुत भाँति जड़ लगे फूल।कहै कबीर या पद को बूझै, ताँकूँ तीन्यूँ त्रिभुवन सूझै॥11॥

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