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पाँड़े न करसि बाद बिबादं, या देही बिना सबद न स्वादं

पद · लगभग २ मिनट
पाँड़े न करसि बाद बिबादं, या देही बिना सबद न स्वादं॥ टेक॥अंड ब्रह्मंड खंड भी माटी माटी नवनिधि काया।माटी खोजत सतगुर भेट्या, तिन कछू अलख लखाया॥जीवत माटी मूवा भी माटी, देखौ ग्यान बिचारी।अंति कालि माटी मैं बासा, लेटे पाँव पसारी॥माटी का चित्र पवन का थंभा, ब्यंद संजोगि उपाया।भाँनैं घड़े सवारै सोई, यहु गोब्यंद की माया।माटी का मंदिर ग्यान का दीप पवन बाति उजियारा।तिहि उजियारै सब जग सूझै कबीर ग्याँन बिचारा॥249॥

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