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ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक! धीरे धीरे

कविता · लगभग २ मिनट
ले चल वहाँ भुलावा देकरमेरे नाविक! धीरे धीरे ।जिस निर्जन में सागर लहरी,अंबर के कानों में गहरी-निश्छल प्रेम-कथा कहती हो,तज कोलाहल की अवनी रे!जहाँ साँझ-सी जीवन छाया,ढीले अपनी कोमल काया,नील नयन से ढुलकाती हो,ताराओं की पाँति घनी रे!जिस गंभीर मधुर छाया में -विश्व चित्र-पट चल माया में -विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-दुःख-सुख वाली, सत्य बनी रे!श्रम-विश्राम क्षितिज वेला से-जहाँ सृजन करते मेला से-अमर जागरण उषा नयन से-बिखराती हो ज्योति घनी रे !

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