तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥भवसागर में बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी।इण संसार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी।मीरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
बरसै बदरिया सावन की सावन की मनभावन कीमीराबाईकविताबरसै बदरिया सावन की सावन की मनभावन कीमीराबाई२ मिनट का पाठ