जदपि मैं बहुतै जतन करे।तदपि, मधुप! हरि-प्रिया जानि कै काहु न प्रान हरे॥सौरभ-युत सुमनन लै निज कर संतत सेज धरे।सनमुख होति सरद-ससि, सजनी! तऊ न अङ्ग जरे॥चातक मोर कोकिला मधुकर सुर सुनि स्रवन भरे।सादर ह्वै निरखति रतिपति को नैक न पलक परे॥निसिदिन रटति नंदनँदन, या उर तें छिन न टरे।अति आतुर चतुरंग चमू सजि अनँग न सर सँचरे॥जानति नाहिं कौन गुन या तन जातें सबै डरे।सूरदास सकुचन श्रीपति के सुभटन बल बिसरे॥३३०॥

जदपि मैं बहुतै जतन करे
सूरदासपद · लगभग २ मिनट