प्रेम बिवस्था देखि सुद्ध यों भक्ति प्रकासी।दुबिधा ग्यान गलानि मंदता सगरी नासी॥कहत भयौ निश्चै यही हरि रस की निज पात्र।हौं तो कृतकृत है गयौ इनके दरसन मात्र॥मेटि मल ग्यान को॥पुनि पुनि कह हरि कहन बात एकांत पठायौ।मैं इनको कछु मरम जानि एको नहिं पायौ॥हौं कह निज मरजाद की ग्यान रु कर्म निरूपि।ये सब प्रेमासक्त होइ रहीं लाज कुल लोपि॥धन्य ये गोपिका॥जे ऐसी मरजाद मेटि मोहन को ध्यावें।काहे न परमानंद प्रेम पदवी को पावैं॥ग्यान जोग सब कर्म तें परे प्रेम ही सांच।हौं या पटतर देत हौं हीरा आगे कांच॥बिषमता बुद्धि को॥धन्य-धन्य ये लोग भजत हरि कौं जे ऐसे।और कोऊ बिनु रसहि प्रेम पावत है कैसे॥मेरे वा लघु ग्यान कौं उर में मद होइ ब्याधि।अब जान्यौं ब्रज प्रेम की लहत न आधी आधि॥बृथा स्रम करि मर्यो॥

भंवरगीत (उद्धव की प्रेमदशा)
नंददासपद · लगभग २ मिनट