राग नट मोहन माँग्यो अपनो रूप।या ब्रज बसत अँचै तुम बैठी, ता बिनु तहाँ निरूप॥मेरो मन, मेरो, अलि! लोचन लै जो गए धुपधूप।हमसों बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप॥अपनो काज सँवारि सूर, सुनु, हमहिं बताव त कूप।लेवा-देइ बराबर में है, कौन रंक को भूप ॥८२॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+