सुनियत मुरली देखि लजात।दूरहि तें सिंहासन बैठे, सीस नाय मुसकात॥सुरभी लिखी चित्र भीतिन पर तिनहिं देखि सकुचात।मोरपंख को बिजन बिलोकत बहरावत कहि बात॥हमरी चरचा जो कोउ चालत, चालत ही चपि जात।सूरदास ब्रज भले बिसार्यो, दूध दही क्यों खात?॥२७९॥

सुनियत मुरली देखि लजात
सूरदासपद · लगभग २ मिनट