राग मलार स्याममुख देखे ही परतीति।जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति॥नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं।कहौ कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं॥यह मन एक, एक वह मूरति, भृंगकीट सम माने।सूर सपथ दै बूझत ऊधो यह ब्रज लोग सयाने॥३३॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+