देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन-रैन।लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥
रहिमन निज मनकी बिथा, मन ही राखौ गोय ।सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥
रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर।जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगि है देर॥
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
रहिमन धागा प्रेम को, मति तोरो चटकाइ।टूटे से फिरि ना मिलै, मिले गाँठि परि जाइ॥
