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हाशिया
कविता
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान
सहजोबाई
दोहा · लगभग २ मिनट
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।
अजपा सुमिरण कहत हूं, उपजै केवल ज्ञान॥
॥
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प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर
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अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंड
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कविता
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सहजोबाई
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