बाल्हा आव हमारे गेहु रे, तुम्ह बिन दुखिया देह रे॥ टेक॥सब को कहै तुम्हारी नारी, मोकौ इहै अदेह रे।एकमेक ह्नै सेज न सोवै, तब लग कैसा नेह रे॥आन न भावै नींद न आवै, ग्रिह बन धरै न धीर रे।ज्यूँ कामी कौ काम पियारा, ज्यूँ प्यासे कूँ नीर रे॥है कोई ऐसा परउपगारी, हरि सूँ कहै सुनाइ रे॥ऐसे हाल कबीर भये हैं, बिन देखे जीव जाइ रे॥307॥

