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मोह्यो मृग देखि बन अंधा

सबद · लगभग २ मिनट
मोह्यो मृग देखि बन अंधा।सूझत नहीं काल के फंदा॥फूल्यौ फिरत सकल बन माहीं।सिर साँधे सर सूझत नाहीं॥उदमद मातौ बन के ठाट।छाडि चल्यौ सब बारह बाट॥फँध्यो न जानै बन के चाइ।दादू स्वाद बँधानौ आइ॥

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