मोह्यो मृग देखि बन अंधा।सूझत नहीं काल के फंदा॥फूल्यौ फिरत सकल बन माहीं।सिर साँधे सर सूझत नाहीं॥उदमद मातौ बन के ठाट।छाडि चल्यौ सब बारह बाट॥फँध्यो न जानै बन के चाइ।दादू स्वाद बँधानौ आइ॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
निरंतर पिउ पाइया, तहँ पंखी उनमन जाइदादू दयालकवितानिरंतर पिउ पाइया, तहँ पंखी उनमन जाइदादू दयाल२ मिनट का पाठ
सतगुर माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइदादू दयालकवितासतगुर माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइदादू दयाल२ मिनट का पाठ
रँग भरि खेलौं पिउ सौं, तहँ बाजै बेन रसालदादू दयालकवितारँग भरि खेलौं पिउ सौं, तहँ बाजै बेन रसालदादू दयाल२ मिनट का पाठ