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ऐसी मेरी जाति बिख्यात चमारं

सबद · लगभग २ मिनट
ऐसी मेरी जाति बिख्यात चमारं, हिरदै राम गोब्यंद गुण सारं॥ टेक॥सुरसी जल लीया क्रित बारुनी रे, जिसे संत जन कर नहीं पान।सुरा अपवित्र निति गंगा जल मानीऐ, सुरसरी मिलत नहीं होत आन॥तर तारि अपवित्र करि मानिऐ, जैसे कागरा करत विचारं।भगत भगवंत जब ऊपरै लेखीए, तब पूजीऐ करि नमस्कारं॥अनेक अधम जीव नावं गुनि ऊधरि, पतित पावल भए परसि सारं।भणत रैदास ररंकार गुण गावंत, संत साधु भऐ सहजि पारं॥

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