माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवैं पडन्त।कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उतरन्त॥२०॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीरकवितास्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीर२ मिनट का पाठ