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हाशिया
कविता
डागल ऊपरि दौड़णाँ, सुख निदणीं न सोइ
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
डागल ऊपरि दौड़णाँ, सुख निदणीं न सोइ।
पूनै पाये द्यौंहड़े ओछी ठौर न कोइ॥५६॥
॥
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जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै नाहिं
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ढोल दमामा दुड़ बड़ी, सहनाई संग मेरि
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