राम बिन जन्म मरन भयौ भारी।साधिक सिध सूर अरु सुरपति भ्रमत भ्रमत गए हारी॥ टेक॥व्यंद भाव म्रिग तत जंत्राक, सकल सुख सुखकारी।श्रवन सुनि रवि ससि सिव सिव, पलक पुरिष पल नारी॥अंतर गगन होत अंतर धुँनि बिन सासनि है सोई।घोरत सबद सुमंगल सब घटि, ब्यंदत ब्यदै कोई॥पाणीं पवन अवनि नभ पावक, तिहि सँग सदा बसेरा।कहै कबीर मन मन करि बेध्या, बहुरि न कीया फेरा॥172॥

