राग जैतश्री
अति मलीन बृषभानुकुमारी।हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी।अधोमुख रहति उरध नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी।छूटे चिहुर, बदन कुम्हिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी॥हरि-सँदेस सुनि सहज मृतक भईं, इक बिरहिनि दूजे अलि जारी।सूर स्याम बिनु यों जीवति हैं ब्रजबनिता सब स्यामदुलारी॥१००॥


