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अब जागो जीवन के प्रभात! वसुधा पर ओस बने बिखरे

कविता · लगभग २ मिनट
अब जागो जीवन के प्रभात!वसुधा पर ओस बने बिखरेहिमकन आँसू जो क्षोभ भरेऊषा बटोरती अरुण गात!अब जागो जीवन के प्रभात!तम-नयनों की ताराएँ सब-मुँद रहीं किरण दल में हैं अब,चल रहा सुखद यह मलय वात!अब जागो जीवन के प्रभात!रजनी की लाज समेटो तो,कलरव से उठ कर भेंटो तो,अरुणांचल में चल रही वात!अब जागो जीवन के प्रभात!

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