ऊधो! इतनी कहियो जाय।अति कृसगात भई हैं तुम बिनु बहुत दुखारी गाय॥जल समूह बरसत अँखियन तें, हूंकत लीने नाँव।जहाँ जहाँ गोदोहन करते ढूँढ़त सोइ सोई ठाँव॥परति पछार खाय तेहि तेहि थल अति व्याकुल ह्वै दीन।मानहुँ सूर काढ़ि डारे हैं बारि मध्य तें मीन॥१७१॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हरि न मिले री माई! जन्म ऐसे ही लाग्यो जानसूरदासकविताहरि न मिले री माई! जन्म ऐसे ही लाग्यो जानसूरदास२ मिनट का पाठ