बैठी तिया गुरुलोगन मैं, रति तैं अति सुंदर रूप विसेखी।आयो तहाँ ‘मतिराम’ सुजान, मनोभव सौं बढ़ि कांति उरेखी॥लोचन रूप पियो ही चहैं अरु, लाजनि जात नहीं छबि देखी।नैन नमाय रही हिय-माल मैं, लाल की मूरति लाल मैं देखी॥

बैठी तिया गुरुलोगन मैं
मतिरामसवैया · लगभग २ मिनट