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एक आदमी को कितनी जमीन चाहिए

अनूदित कहानी · लगभग १६ मिनट

क दिन उर्मिला अपनी छोटी बहन निर्मला से गाँव में मिलने आयी। उर्मिला एक धनी सौदागर को ब्याही थी और निर्मला गाँव में एक गरीब किसान के साथ। भोजन करते समय उनमें यों बातचीत होने लगी!

उर्मिला – निर्मला, मुझे गाँव में रहना पड़े तो जरा भी जी न लगे। देखो, हम नगर में रहकर कैसे सुन्दर वस्त्र पहनती है, नाना प्रकार के व्यंजन खाती हैं, नाटक-तमाशे देखती हैं, बाग-बगीचों में सैर करती हैं और सदैव रंग-रेलियाँ मनाती हैं।

निर्मला – (अभिमान से) मुझसे कहती हो? मैं तो कभी तुम्हारे साथ अदला-बदली न करूँ। माना कि हम मोटा-झोंटा खाते हैं, लेकिन हमें रात-दिन चिंता तो नहीं घेरे रहती। तुम्हें तो सदैव लगी रहती है। हानि-लाभ दो जुड़वाँ भाई हैं। जो आज राजा है, वही कल कंगाल है। यहाँ तो सदैव एक-रस रहते है। किसान धनवान नहीं बन सकते, लेकिन अन्न-वस्त्र की तो उनको कमी हो ही नहीं सकती।

उर्मिला – अन्न की एक ही कही। तुम तो पशु हो। रीति-नीति, आचार-व्यवहार क्या जानो? कितना ही मरो-खपो, तुम और तुम्हारी सन्तान एक दिन इसी खाद के ढेर पर प्राण-त्याग कर देगी और बस।

निर्मला – इससे क्या! मरना तो एक दिन सभी को है। खेती का काम कठिन है, पर हमें किसी का भय नहीं, न किसी को मस्तक झुकाना पड़ता है। नगर में रहते हुए मनुष्य का चित्त चंचल रहता है। क्या जाने, कल तुम्हारा पति मद्य-सेवी बनकर जुआरी और वेश्यागामी हो जाए। ऐसी बातें आये दिन सुनने में आया करती है।

मथुरा चारपाई पर पड़ा हुआ यह बातें सुन रहा था। मन में सोचने लगा, मेरी स्त्री कहती तो सच है। हम बालपन से ही खेतों के काम में लगे रहते हैं कि हमें कु कर्म करने का ध्यान तक नहीं आता, पर दुःख यही है कि हमारे पास कु छ नहीं। हमारे पास खेत नहीं हैं। यदि मेरे पास धरती काफी हो जाए तो फिर चाँदी है। संयोग से अधर्म भी वहाँ बैठा यह बातें सुन रहा था। मथुरा में धरती की लालसा उत्पन्न होते देखकर प्रसन्न हो कहने लगा कि इसी तृष्णा के वश एक दिन इसका सर्वनाश करूँगा।

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इस गाँव के समीप एक जमींदारिन रहती थी, जिसके पास दो सौ बीघे भूमि थी। उसने एक बूढ़ा सिपाही कारिं दा रख छोड़ा था। वह कारिं दा असामियों को बड़ा दुःख देता था। मथुरा अपने पशुओं को संभाल-संभालकर रखता था, पर कभी-कभी वे उसके खेत-खलिहान में चले ही जाते थे। कई बार उसकी ओर कारिं दे की लड़ाई हुई। मथुरा अत्यन्त दुःखी हो गया था।

कु छ दिन उपरान्त यह चर्चा फै ली कि बुढ़िया अपनी रियासत बेचती है और गाँव का बनिया उसे मोल लेने को तैयार है। गाँव वाले डरे कि यदि बनिया मालिक बन गया, तो उसके सिपाही कारिं दे से भी अधिक दुःख देंगे। उचित यह है कि सब मिलकर रियासत खरीद लें, परन्तु अधर्म ने उनमें ऐसी फू ट डाली कि वे लोग कोई निश्चय न कर सके । तब उन्होंने फै सला किया कि लोग अपने-अपने नाम से भूमि खरीदें। बुढ़िया इस पर भी राजी हो गई। एक किसान ने पचास बीघा धरती बुढ़िया से इस शर्त पर मोल ली कि आधा दाम तुरन्त दूँगा और आधा एक वर्ष पीछे।

यह सुनकर मथुरा के मन में भी ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उसने विचारा कि कु छ भी हो, चालीस बीघा धरती अवश्य मोल लेनी चाहिए। सौ रुपये घर में जमा थे, बाकी कु छ अनाज और बैल बेचकर चालीस बीघा धरती खरीद ही ली। आधा दाम पहले दे दिया, आधा दो वर्ष पीछे चुका देने का वचन दिया।

मथुरा बड़ा पुरुषार्थी था। खूब मेहनत से खेत जोते-बोए। फसल अच्छी लगी। दो वर्ष के भीतर ऋण चुक गया। अब वह अपने खेतों, पशुओं, भूसे, खलिहान, चरांद को देखकर फू ला न समाता। यह खेत वहाँ पहले भी थे और मथुरा उन्हें नित्य देखा भी करता था, परन्तु ममत्व हो जाने के कारण उनको देखने में अब कु छ और ही आनन्द मिलता था।

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अब मथुरा के पास अपनी जमीन थी और उसके दिन सुख के कट सकते थे; परन्तु पड़ोसी बड़ा दुःख देने लगे। कभी कोई खेत में बैल छोड़ देता, कभी गाँव के बालक चरांद में डंगर चराने लगते। पहले-पहले तो वह सब सहन करता रहा, पर कहाँ तक करे? उसने विचारा कि यदि इस प्रकार चुप लगाए रहूँगा तो यह चैन न लेने देंगे। आखिर उसने नालिश करके कई मनुष्यों पर दंड लगवा दिया। लोग इससे जलकर और भी दुःख देने लगे।

एक रात दयाराम ने मथुरा की धरती में से सारे वृक्ष काट डाले। उसने प्रातःकाल जाकर देखा तो सारे वृक्ष कटे पड़े है। आग हो गया। सोचने लगा, यह किसकी शरारत है? कोई एक-आध वृक्ष काट लेता तो खैर कु छ बात न थी, पर इस चांडाल ने तो एक भी वृक्ष न छोड़ा। हो न हो, यह उपद्रव तो दयाराम ने किया है।

बस, क्रोध से भरा हुआ वह दयाराम के घर पहुँचा और बोला – तुमने वृक्ष क्यों काटे। दयाराम लड़ने-मरने पर तैयार हो गया – कैसे वृक्ष? किसने काटे? जाओ, नहीं तो अभी सिर फोड़ देता हूँ। मथुरा भला यह बातें कब तक सह सकता था? तुरन्त कचहरी में पहुँचा और नालिश ठोंक दी। फै सला होने पर दयाराम कोरा बच गया। वृक्ष काटने का कोई साक्षी न था। मथुरा जल-भुनकर हाकिमों को गालियाँ देने लगा कि तुम चोरों को छोड़ देते हो, तुम स्वयं चोर हो इत्यादि। तात्पर्य यह हैं कि अब कोई दिन ऐसा न था कि पड़ोसियों से उसका लड़ाई-झगड़ा न हो। पहले जब घर की एक बिस्वा धरती पास न थी, तो वह बड़ा सुखी था। अब नित्य क्लेश रहता था। कु छ समझ में न आता था कि क्या करूँ।

इन्हीं दिनों गाँव में यह चर्चा हुई कि लोग घर-बार छोड़कर किसी नये देश में जाने का विचार कर रहे है। मथुरा बड़ा प्रसन्न हुआ कि उजाड़ हो जाने पर बहुत-सी धरती मिल जाएगी, आनन्दपूर्वक दिन काटूँगा।

एक दिन मथुरा के घर में एक अतिथि आया। मथुरा ने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया। रात्रि को भोजन करते समय अतिथि बोला कि सरकार ने पंजाब में एक नई बस्ती बसाई है। मनुष्य पीछे पच्चीस बीघा जमीन मिलती है। जमीन बड़ी सुन्दर है। अभी अक मनुष्य खाली हाथ वहाँ आया था, दो वर्ष के अन्दर मालामाल हो गया।

यह सुनकर मथुरा को तृष्णा ने आ घेरा। कहने लगा – मैं इस अंधकू प में क्यों सडूँ। घर-बार बेचकर उस नई बस्ती में ही क्यों न चला जाऊँ ? यहाँ तो पड़ोसियों ने विपत्ति में जान डाल रखी है। परन्तु पहले जाकर देख आऊँ । उन दिनों रेल न थी। तीन सौ मील पैदल चलने का कष्ट उठाकर वहाँ पहुँचा। देखा कि अतिथि सच कहता था। मनुष्य पीछे पच्चीस बीघा जमीन मिली हुई है। यदि कोई चाहे तो एक रुपया बीघा पर अधिक धरती भी मोल ले सकता है।

बस फिर क्या था, देख-भाल करके तुरन्त घर को लौट आया और धरती, मकान, पशु आदि सब बेचकर नवीन बस्ती को चल दिया। हाय तृष्णा!

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मथुरा कु टुम्ब सहित नई बस्ती में पहुँचा और चौधरियों से मित्रता करके एक सौ पैंतीस बीघा धरती ले ली और मकान बनाकर वहाँ निवास करने लगा।

इस बस्ती में यह रीति थी कि एक ही खेत में लगातार दो वर्ष बाहने-बोने के पीछे धरती को छोड़ना पड़ता था कि ताकि धरती निकम्मी न होने पावे। लोभ पाप का मूल है। पहले-पहले तो मथुरा आनन्द-सहित अपना काम करता रहा, परन्तु अब उसके ध्यान में 135 बीघा धरती भी थोड़ी थी। उसकी लालसा तो यह थी कि सारी धरती में गेहूँ बोए। धरती परती छोड़े तो कहाँ से छोड़े ? फिर उसने देखा कि बहुत लोग पंचायत से अलग जमीन लेकर खेती करके धन-संचय करने लगे हैं। अतएव वह सदा चिंताग्रस्त रहने लगा।

फल यह हुआ कि वह दूसरों के खेत बटाई पर खेती करने लगा। यद्यपि बहुत-सा धन एकत्र कर चुका था, तिस पर तृष्णा बढ़ती ही जाती थी। तीसरे वर्ष ठीक फसल के समय जब बटाई वाली धरती में गेहूँ पके खड़े थे, तो मालिक ने अपनी धरती छु ड़ा ली। फिर तो मथुरा के क्लेश की कोई सीमा रही। कहने लगा कि यदि आज यह धरती मेरी अपनी होती, तो क्या ऐसा हो सकता था।

दूसरे दिन मालूम हुआ कि पड़ोसी अपनी तेरह सौ बीघा धरती पंद्रह सौ रुपये में बेचता है। सौदा पक्का हो रहा था कि अकस्मात् एक अतिथि आ पहुँचा।

अतिथि – (मथुरा से) तुम बड़े ही मूर्ख हो कि पंद्रह सौ रुपये में तेरह सौ बीघा धरती मोल लेते हो। गुजरात देश में क्यों नहीं चले जाते? वहाँ धरती बड़ी सस्ती है। मैंने वहाँ एक हजार रुपये में तेरह हजार बीघा धरती मोल ली है। वहाँ का राजा बड़ा सीधा-सादा है। बस वहाँ जाकर उसे प्रसन्न कर लो, जितनी धरती चाहोगे, मिल जाएगी। मथुरा ने उसका कहना मान लिया और इस बस्ती में धरती लेने का विचार छोड़ दिया।

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दूसरे दिन मथुरा कु टुम्ब को बस्ती में छोड़कर एक नौकर साथ ले, एक हजार रुपये पल्ले बाँध, गुजरात को चल दिया। पाँच सौ मील चलने पर वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि सब लोग डेरों में रहते हैं, न कोई धरती बोता है, न अन्न खाता है। गाय, भैंस, घोड़े इत्यादि तराई में चरते-फिरते हैं। स्त्रियाँ दूध दुहकर मक्खन आदि बना लेती हैं, यही उनकी जीविका है। सब लोग हँसते- खेलते, गाते-बजाते, आनन्द-सहित काल व्यतीत कर रहे हैं। कोई झगड़ा है, न लड़ाई। सब-के -सब अनपढ़ और मूर्ख है। परन्तु कपट का नाम नहीं।

मथुरा को देखकर वे लोग बड़े आनन्दित हुए और बड़ी आवभगत से उसे एक डेरे में ले गए। मथुरा ने उन्हें कु छ पदार्थ भेंट किए। लोग – (भेंट लेकर) महाशय, यहाँ की रीति है कि जो कोई हमें भेंट देता है, उसके बदले में हम उसे कु छ अवश्य देते हैं, इस कारण आप बतलाइए कि आप क्या चाहते हैं।

मथुरा – मुझे के वल धरती की अभिलाषा है। हमारे देश में बस्ती बढ़ जाने के कारण माता ने फल देना छोड़ दिया है। तुम्हारी धरती अच्छी मालूम होती है।

लोग – (हँसकर) हाँ-हाँ! यह बात तो नहीं। धरती जितनी चाहो ले लो, परन्तु हम अपने राजा से पूछ लें।

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इतने में राजा भी वहाँ आ गया। यह बातें सुनकर मथुरा से कहने लगा – हाँ, जितनी भूमि चाहो ले लो।

मथुरा – मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, मुझे बहुत नहीं चाहिए। हाँ, इतनी बात है कि धरती नाप-कर पट्टा लिख दीजिए। मरना- जीना बना हुआ है, लिखा-पढ़ी बिना सौदा ठीक नहीं होता। आज आप दे दें, कल स्यात् आपकी संतान मुझसे धरती छीन ले तो क्या बना लूँगा। राजा – बहुत ठीक, धरती नाप-कर पट्टा लिख देंगे।

मथुरा – दाम क्या होंगे।

राजा – हम एक बात जानते हैं, दूसरी नहीं। बस एक दिन की एक सहस्र मुद्रा।

मथुरा – दिन का क्या हिसाब है, मैंने नहीं समझा।

राजा – भाई साहब, बीघा-सीघा हम कु छ नहीं जानते, हम तो एक दिन की एक सहस्र मुद्रा लेते हैं। सूर्योदय से सूर्यास्त तक जितना चक्कर कोई मनुष्य काट लें, उतनी ही धरती उसकी हो जाती है।

मथुरा – कहा कहा? एक दिन में तो मनुष्य बड़ा भारी चक्कर काट सकता है।

राजा – हाँ, तो क्या हुआ। परन्तु एक बात यह है कि जहाँ से चलोगे, सूर्यास्त से पहले-पहले तुम्हें वहाँ आना पड़े गा।

मथुरा – भला चक्कर का चिह्न कौन लगाएगा।

राजा – तुम एक कु दाल ले जाना और गढ़े देते जाना, परन्तु यह याद रहे कि जहाँ से चलो सूर्यास्त से पहले वहीं आ जाना।

मथुरा – बहुत अच्छा।

यह बातें सुनकर मथुरा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। 7

निद्रा कहाँ? मथुरा रात-भर इसी सोच-विचार में रहा कि मैं पैंतीस मील का चक्कर सहज में काट सकता हूँ। ओ हो, पैंतीस मील! फिर तो मैं बड़ा इलाके दार बन जाऊँ गा। सौभाग्य से दिन भी बड़े हैं। पैंतीस मील धरती बहुत होती है! घटिया धरती बेच डालूँगा, अच्छे-अच्छे खेत आप रख लूँगा।

दिन निकलने से पहले मथुरा की एक क्षण के लिए आँखें झपक गई। क्या स्वप्न देखता है कि गुजरात देश का राजा सम्मुख खड़ा हँस रहा है। पास जाकर हँसने का कारण पूछा तो जान पड़ा कि राजा नहीं, वह तो गुजरात देश का सूचना देने वाला अतिथि है। तुम कहाँ! पर मालूम हुआ, वह तो नवीन बस्ती की बात बतलाने वाला बटुक है। समीप जाकर देखने लगा तो बटुक कहाँ! वहाँ तो साक्षात् अधर्मराज मुँह बाये खड़े हैं और उनके पैरों के नीचे धोती-कु रता पहने एक पुरुष चित्त मरा पड़ा है। झुककर देखा तो मथुरा! वह भयभीत होकर उठ बैठा। ओ हो, स्वप्न में भी क्या-क्या भयंकर दृश्य दिखाई पड़ते हैं।

सूर्य उगते ही वह राजा-सहित जंगल को चल दिया। 8

जंगल में पहुँचकर राजा ने कहा कि जहाँ तक दृष्टि जाती है, हमारा ही देश है। कहीं से चक्कर काटना आरम्भ कर दो। देखो, मैं यह छड़ी रख देता हूँ। बस, सूर्यास्त से पहले यहाँ आ जाना।

मथुरा छड़ी पर एक हजार रुपये रखकर, रोटी पल्ले बाँध, छड़ी हाथ में ले, चक्कर काटने लगा। तीन मील चलने पर एक पहर दिन चढ़ आया। उसे गरमी सताने लगी।

मथुरा ने मन में कहा, दिन में चार पहर होते है, अभी तो तीन पहर शेष है। अभी लौटना उचित नहीं। जूते उतार डालूँ, नंगे पैर चलने में सुभीता होगा। तीन मील और जाकर बायीं ओर फिर जाऊँ गा। अहा हा! यह टुकड़ा तो बहुत ही अच्छा है, भला यह कहीं छोड़ने योग्य है! यहाँ तो ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता हूँ, अच्छी ही अच्छी धरती आती जाती है। (फिर कर) ओ हो! राजा आदि तो कोई दिखाई नहीं पड़ता, शायद दूर निकल आया। अब लौटना चाहिए। गरमी बढ़ गई है। प्यास से गला सूखा जाता है। उसके बायीं ओर लौटते-लौटते दोपहर हो गई, तब वह जरा दम लेने को बैठ गया। रोटी निकालकर खायी, पानी पिया और फिर चल खड़ा हुआ। सूर्य का तेज सहा न जाता था। गरमी इतनी थी कि शरीर झुलसा जाता था। परन्तु तृष्णा का भूत सिर पर सवार था। करे तो क्या करे! कहने लगा, क्या चिन्ता है! अभी दुःख फिर सुख; चलो। चलते-चलते दूर निकल गया, तब उसे ध्यान आया, यह तो बुरा हुआ। मैंने बड़ी चूक की, अब यदि पूरा घेरा देकर धरती को ठीक चौकोर बनाऊँ गा तो सूर्यास्त से पहले छड़ी तक पहुँचना असम्भव है। अच्छा तिकोना ही रहने दो। यहीं से लौट चलो। ऐसा न हो कि सूर्य अस्त हो जाए और मैं बीच में ही रह जाऊँ ।

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मथुरा नाक की सीध में छड़ी की ओर चलने लगा। गरमी के मारे उसका मुँह सूख गया, शरीर जल उठा, पाँव घायल हो गए, टांगे थक गई। ठहरे कैसे? सूर्य उसका चाकर तो था नहीं कि उसके लिए खड़ा रह जाता।

सोचने लगा – हाय-हाय! यह मैंने क्या किया? मुझे क्या लालच ने मार गिराया। सूर्य डूबने आया, छड़ी का अभी तक कहीं पता ही नहीं, करूँ तो क्या करूँ! हे भगवान्! अब साफा सिर से फें क, लाठी छोड़कर वह दौड़ने लगा।

दौड़ते-दौड़ते छाती लोहार की धौंकनी बन गई। उसका हृदय धड़कने लगा। वह सिर से पैरों तक पसीने में डूब गया। उसकी टांगे लड़खड़ा गईं। उसने समझा कि अब प्राण गये। चिल्ला पड़ा – हाय, सारी के लालच में आधी भी खो बैठा! परन्तु इतना कष्ट उठाकर यदि ठहर जाऊँ गा, तो लोग मुझे महामूर्ख समझेंगे। दौड़ो, जैसे बन सके , छड़ी पर पहुँचो।

इतने में उसे विराट देशवासियों का शब्द सुनायी देने लगा। सूर्य डूबने को हुआ, लाली छा गई। छड़ी सामने दिखाई देने लगी, पास राजा बैठा है, छड़ी पर एक सहस्र मुद्रा पड़ी हुई है। उसे रात्रि वाला स्वप्न स्मरण हुआ। निराश होकर बोला – धरती तो मिल गई, परन्तु क्या मैं छड़ी तक पहुँच सकता हूँ?

इतने में सूर्य अस्त हो गया। टीले पर वे किस प्रकार पहुँचे? वह चिल्ला उठा – हाय-हाय! मेरा सारा परिश्रम निष्फल हुआ, सूर्य अस्त हो गया।

लोग टीले पर बैठे हुए पुकारने लगे – नहीं-नहीं, सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ, दौड़ो। वह जी तोड़कर दौड़ा और अन्त में टीले पर चढ़ गया। देखा कि छड़ी पड़ी है, राजा पास बैठा हँस रहा है। फिर स्वप्न याद आया, उसकी टाँगे काँप गई। वह मुँह के बल पृथ्वी पर गिर पड़ा।

गिरते हुए उसका हाथ छड़ी को जा लगा। राजा बोला – बड़ा उद्यमी है, इसने कितनी धरती पर अधिकार जमा लिया।

नौकर जाकर उठाने लगा तो देखा कि मथुरा के मुख से रुधिर की धारा बह रही है और वह मरा पड़ा है।

फिर क्या था, सबने वहीं जंगल से लड़कियाँ एकत्र करके उसका दाह-कर्म किया और सबको विदित हो गया कि उसे के वल डेढ़ गज भूमि की आवश्यकता था।

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