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ऊधो! कुलिस भई यह छाती

पद · लगभग २ मिनट

राग मलार

ऊधो! कुलिस भई यह छाती।मेरो मन रसिक लग्यो नँदलालहि, झखत रहत दिनराती॥तजि ब्रजलोक, पिता अरु जननी, कंठ लाय गए काती।ऐसे निठुर भए हरि हमको कबहुँ न पठई पाती॥पिय पिय कहत रहत जिय मेरो ह्वै चातक की जाती।सूरदास प्रभु प्रानहिं राखहु ह्वै कै बूँद-सवाती॥२२१॥

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