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हाशिया
कविता
माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार
दरिया (बिहार वाले)
दोहा · लगभग २ मिनट
माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार।
सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहे करार॥
॥
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प्रेम ज्ञान जब उपजे, चले जगत कंह झारी
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