ताहि भंवर सो कहत सबै प्रति उत्तर बातें।तर्क बितर्कन जुक्त प्रेम रस रूपी घातें॥जनि परसौ मम पाय हो गयौ अनंद-रस-चोर।तुमही सों कपटी हुतो नागर नंदकिसोर॥इहां तें दूरि हो॥कोउ कहै रे मुधुप कहा मोहन गुन गावै।हृदय कपट सों परम प्रेम नाहिंन छबि पावे॥जानति हौ हरि भांति कै सरबसु लियो चुराय।ऐसी बहु ब्रजबासिनी को जु तुमें पतियाय॥लहे हम जानिक॥कोउ कहै रे मधुप कहा तू रस को जाने।बहुत कुसुम पैं बैठि सबन आपुन रस माने॥आपुन सों हमकों कियौ चाहतु है मतिमंद।दुबिधा रस उपजाय कै दूषित प्रेम अनंद॥कपट के छंद सों॥कोउ कहै रे मधुप होहिं तुम से जो संगी।क्यों न होइ तन स्याम सकल बातन चतुरंगी॥गोकुल में जोरी कोऊ पावत नाहिं मुरारि।मनों त्रिभंगी आपु हैं करी त्रिभंगी नारि॥रूप गुन सील की॥कोउ कहै रे मधुप स्याम जोगी तुम चेला।कुबुजा तीरथ जाइ कियौ इंद्रिन को मेला॥मधुबन सुधिहिं बिसारिकै आए गोकुल माहिं।इत सब प्रेमी सबत हैं तुमरौ गांहक नाहिं॥पधारौ रावरे॥कोउ कहे सखि बिस्व माहिं जेतिक हैं कारे।कपट कोटि के परम कुटिल मानुस बिषवारे॥एक स्याम तन परसि के जरत आजु लौ अंग।ता पाछे फिरि मधुप यह लायो जोग भुअंग॥कहा इनको दया॥इहि बिधि सुमिरि गोबिंद कहत ऊधौ प्रति गोपी।भृंग संग्या करि कहत सकल कुल लज्या लोपी॥ता पाछे एक बारही रोई सकल ब्रजनारि॥हा! करुनामय नाथ हो! केसौ! कृष्ण मुरारि!फाटि हिय दृग चल्यौ॥

भंवरगीत (भ्रमर प्रति उपालंभ)
नंददासपद · लगभग २ मिनट