बिलग जनि मानहु, ऊधो प्यारे!वह मथुरा काजर की कोठरि जे आवहिं ते कारे॥तुम कारे, सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भँवारे।तिनके संग अधिक छबि उपजत कमलनैन मनिआरे॥मानहु नील माट तें काढ़े लै जमुना ज्यों पखारे।ता गुन स्याम भई कालिंदी सूर स्याम-गुन न्यारे॥३८॥

बिलग जनि मानहु, ऊधो प्यारे!
सूरदासपद · लगभग २ मिनट