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डीठि हू को भार जानि देखत न डीठि भरि

कवित्त · लगभग २ मिनट
डीठि हू को भार जानि देखत न डीठि भरि,ऐसी सुकुमारी नैन प्रानहू ते प्यारी है।माधुरी सहज कछू कहत न बनि आवै,नेक ही के चितवन चकित बिहारी है॥कौन भांति मुख की अनूप कांति सरसाति,करत विचार तऊ जात न बिचारी है।हित ध्रुव मन पर्यो रूप के भँवर मांझ,नेह बस भये सुधि देह की बिसारी है॥

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