अरे! आ गई है भूली-सी-यह मधु-ऋतु दो दिन को,छोटी-सी कुटिया मैं रच दूँ,नयी व्यथा-साथिन को !वसुधा नीचे ऊपर नभ हो,नीड़ अलग सबसे हो,झाड़खंड के चिर पतझड़ मेंभागो सूखे तिनको!आशा से अंकुर झूलेंगेपल्लव पुलकित होंगे,मेरे किसलय का लघु भव यह,आह, खलेगा किन को?सिहर भरी कँपती आवेंगीमलयानिल की लहरें,चुंबन लेकर और जगाकर-मानस नयन नलिन को ।जवा- कुसुम-सी उषा खिलेगीमेरी लघु प्राची में,हँसी भरे उस अरुण अधर काराग रँगेगा दिन कोअंधकार का जलधि लाँघ करआवेंगी शशि-किरनें,अंतरिक्ष छिड़केगा कन कननिशि में मधुर तुहिन तुहिन कोइस एकांत सृजन में कोईकुछ बाधा मत डालो,जो कुछ अपने सुंदर से हैंदे देने दो इनको ।

