जासों प्रीति ताहि निठुराई सौं निपट नेह,कैसें करि जिय की जरनि सो जताइयै।महा निरदई, दई कैसैं कैं जिवाऊँ जीव,बेदन की बढ़वारि कहाँ लौं दुराइयै।दु:ख को बखान करिबे कौ रसना कैं होति,ऐपै कहूँ बाको मग्व्र देखन न पाइयै।रैन-दिन चैन को न लेस कहू पैयै, भाग,आपने ही ऐसे, दोष काहि धौं लगाइयै॥

जासों प्रीति ताहि निठुराई सौं निपट नेह
घनानंदकवित्त · लगभग २ मिनट