कबीर पढ़िवा दूरि करि, आथि पढ़्या संसार।पीड़ न उपजी प्रीति सूॅ, तौ क्यूं करि करै पुकार॥३॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीरकवितास्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीर२ मिनट का पाठ