जपि जपि रे जीयरा गोब्यंदो, हित चित परमांनंदौ रे।बिरही जन कौ बाल हौ, सब सुख आनंदकंदौ रे॥ टेक॥धन धन झीखत धन गयौ, सो धन मिल्यौ न आये रे॥ज्यूँ बन फूली मालती, जन्म अबिरथा जाये रे॥प्रांणी प्रीति न कीजिये, इहि झूठे संसारी रे॥धूंवां केरा धौलहर जात न लागै बारी रे॥माटी केरा पूतला, काहै गरब कराये रे॥दिवस चार कौ पेखनौ, फिरि माटी मिलि जाये रे॥कांमीं राम न भावई, भावै विषै बिकारी रे॥लोह नाव पाहन भरी, बूड़त नांही बारी रे॥नां मन मूवा न मारि सक्या, नां हरि भजि उतर्या पारो रे॥कबीर कंचन गहि रह्यौ, काच गहै संसार रे॥398॥

