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हाशिया
कविता
हरी डारि न तोड़िए, लागै छुरा बान
मलूकदास
दोहा · लगभग २ मिनट
हरी डारि न तोड़िए, लागै छुरा बान।
दास मलूका यों कहें, अपना सा जिब जान॥
॥
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सब कोउ साहेब बंदते, हिंदू मुसलमान
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हम जानत तीरथ बड़े, तीरथ हरि की आस
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कविता
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