राग मलार याकी सीख सुनै ब्रज को, रे?जाकी रहनि कहनि अनमिल, अलि, कहत समुझि अति थोरे॥आपुन पद-मकरंद-सुधारस हृदय रहत नित बोरे।हमसों कहत बिरस समझौ, है गगन कूप खनि खोरे।धान को गाँव पयार तें जानौ ज्ञान बिषयरस भोरे।सूर सो बहुत कहे न रहै रस गूलर को फल फोरे॥५६॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+