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गोपालहि लै आवहू मनाय

पद · लगभग २ मिनट

राग मलार

गोपालहि लै आवहू मनाय।अब की बेर कैसेहु करि, ऊधो! करि छल बल गहि पाय॥दीजौ उनहिं सुसारि उरहनो संधि संधि समुझाय।जिनहिं छाँड़ि बढ़िया महँ आए ते विकल भए जदुराय॥तुम सों कहा कहौं हो मधुकर! बातैं बहुत बनाय।बहियाँ पकरि सूर के प्रभु की, नंद की सौंह दिवाय॥३६०॥

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