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माया मोहि मोह हित कीन्हाँ, ताथैं मेरो ग्याँन ध्याँन हरि लीन्हाँ

पद · लगभग २ मिनट
माया मोहि मोह हित कीन्हाँ, ताथैं मेरो ग्याँन ध्याँन हरि लीन्हाँ॥ टेक॥संसार ऐसा सुपिन जैसा, न सुपिन समाँन।साँच करि नरि गाँठि बाँध्यौं, छाड़ि परम निधाँन॥नैन नेह पतंग हुलसै, पसू न पेखै आगि।काल पासि जु मुगध बाँध्या, कलंक काँमिनी लागि॥करि बिचार बिकार परहरि, तिरण तारण सोइ।कहै कबीर रघुनाथ भजि नर, दूजा नाँही कोइ॥245॥

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