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हाशिया
कविता
कढ़ि न नींद भिनुसरवा, आलस पाइ
रहीम
बरवै · लगभग २ मिनट
गणिका-उत्कण्ठिता
कढ़ि न नींद भिनुसरवा, आलस पाइ।
धन दै मूरुख मितवा, रहल लोभाइ॥६४॥
॥
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औरन पाँय जवकवा, नाइन दीन
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करत नही अपरधवा, सपनेहुँ पीव
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हरुए गवन नबेलिआ, डीठि बचाइ
रहीम
कविता
हरुए गवन नबेलिआ, डीठि बचाइ
रहीम
२ मिनट का पाठ
गई आगि उर लाय, आगि लैन आई जु तिय
रहीम
कविता
गई आगि उर लाय, आगि लैन आई जु तिय
रहीम
२ मिनट का पाठ
सुन्दर चतुर धनिकवा, कुल को ऊँच
रहीम
कविता
सुन्दर चतुर धनिकवा, कुल को ऊँच
रहीम
२ मिनट का पाठ