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बड़े घर ताली लागी रे, म्हारां मन री उणारथ भागी रे

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बड़े घर ताली लागी रे, म्हारां मन री उणारथ भागी रे॥छालरिये म्हारो चित नहीं रे, डाबरिये कुण जाव।गंगा जमना सूं काम नहीं रे, मैंतो जाय मिलूं दरियाव॥हाल्यां मोल्यांसूं काम नहीं रे, सीख नहीं सिरदार।कामदारासूं काम नहीं रे, मैं तो जाब करूं दरबार॥काच कथीरसूं काम नहीं रे, लोहा चढ़े सिर भार।सोना रूपासूं काम नहीं रे, म्हारे हीरांरो बौपार॥भाग हमारो जागियो रे, भयो समंद सूं सीर।अम्रित प्याला छांडिके, कुण पीवे कड़वो नीर॥पीपाकूं प्रभु परचो दियो रे, दीन्हा खजाना पूर।मीरा के प्रभु गिरघर नागर, धणी मिल्या छै हजूर॥ 25.बन जाऊं चरणकी दासी रे। दासी मैं भई उदासी॥ ध्रु०॥और देव कोई न जाणूं। हरिबिन भई उदासी॥१॥नहीं न्हावूं गंगा नहीं न्हावूं जमुना। नहीं न्हावूं प्रयाग कासी॥२॥मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमलकी प्यासी॥३॥

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