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अशोक की चिंता

कविता · लगभग ३ मिनट
जलता है यह जीवन-पतंग!जीवन कितना? अति लघु क्षण,ये शलभ पुंज से कण-कण,तृष्णा वह अनलशिखा बन-दिखलाती रक्तिम यौवन।जलने की क्यों न उठे उमंग?है ऊँचा आज मगध-शिर-पदतल में विजित पड़ा गिर,दूरागत क्रन्दन-ध्वनि फिरक्यों गूँज रही है अस्थिर-कर विजयी का अभिमान भंग?इन प्यासी तलवारों सेइनकी पैनी धारों से,निर्दयता की मारों से,उन हिंसक हुंकारों सेनत-मस्तक आज हुआ कलिंग।यह सुख कैसा शासन का?शासन रे मानव मन का!गिरि- भार बना सा तिनका,यह घटाटोप दो दिन का-फिर रवि-शशि- किरणों का प्रसंग।यह महादंभ का दानव-पीकर अनंग का आसव-कर चुका महा भीषण रव,सुख दे, प्राणी को मानवतज विजय पराजय का कुढंग ।संकेत कौन दिखलाती,मुकुटों को सहज गिराती,जयमाला सूखी जाती,नश्वरता गीत सुनाती,तब नहीं थिरकते हैं तुरंग ।वैभव की यह मधुशाला,जग पागल होने वाला,अब गिरा-उठा मतवालाप्याले में फिर भी हाला,यह क्षणिक चल रहा राग-रंग।काली काली अलकों में,आलस, मद-नत पलकों में,मणि मुक्ता की झलकों में,सुख की प्यासी ललकों में,देखा क्षण-भंगुर है तरंग।फिर निर्जन उत्सव-शाला,नीरव नूपुर श्लथ माला,सो जाती है मधुबाला,सूखा लुढ़का है प्याला,बजती वीणा न वहाँ मृदंग।इस नील विषाद गगन में-सुख चपला-सा दुख घन में,चिर विरह नवीन मिलन में,इस मरु-मरीचिका-वन में,उलझा है चंचल मन-कुरंग ।आँसू कन-कन ले छल-छलसरिता भर रही दृगञ्चल,सब अपने में हैं चञ्चल;छूटे जाते सूने पल,खाली न काल का है निषंग।वेदना विकल यह चेतन,जड़ का पीड़ा से नर्तन,लय-सीमा में यह कंपन,अभिनयमय है परिवर्तन,चल रहा यही कब से कुढंग।करुणा गाथा गाती है,यह वायु बही जाती है,ऊषा उदास आती हैमुख पीला ले जाती है,बन मधु-पिंगल संध्या सुरंग ।आलोक किरन है आती,रेशमी डोर खिंच जाती,दृग-पुतली कुछ नच पाती,फिर तम पट में छिप जाती,कलरव कर सो जाते विहंग ।जब पल भर का है मिलना,फिर चिर वियोग में झिलना,एक ही प्रात हैं खिलना,फिर सूख धूल में मिलना,तब क्यों चटकीला सुमन रंग?संसृति के विक्षत पग रे!वह चलती है डगमग रे!अनुलेप सदृश तू लग रे!मृदु दल बिखेर इस मग रे!कर चुके मधुर मधुपान भृंग ।भुनती वसुधा, तपते नग,दुखिया है सारा अग-जग,कंटक मिलते हैं प्रति पग,जलती सिकता का यह मग,बह जा बन करुणा की तरंग,जलता है यह जीवन-पतंग ।

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