सुरति ठीकुली लेज ल्यो, मन् नित डोलनहार।कॅवल कुँवा मैं प्रेम रस, पीवै बारम्बार॥२॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीरकवितास्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीर२ मिनट का पाठ
सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीरकवितासुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीर२ मिनट का पाठ