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हाशिया
कविता
इस जीने का गर्व क्या, कहाँ देह की प्रीत
मलूकदास
दोहा · लगभग २ मिनट
इस जीने का गर्व क्या, कहाँ देह की प्रीत।
बात कहते ढह जात है, बारू की सी भीत॥
॥
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गर्व भुलाने देह के, रचि-रचि बाँधे पाग
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