जाकै हरि सा ठाकुर भाई। सु कति अनत पुकारन जाई।अब कहु राम भरोसा तोरा। तब काहूँ को कौन निहोरा॥तीनि लोक जाके इहि भार। मो काहे न करै प्रतिपार।कहु कबीर इक बुद्धि बिचारी। क्या बस जौ बिष दे महतारी॥82॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीरकवितासुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीर२ मिनट का पाठ