राग धनाश्री
ऊधो! तुम कहियो ऐसे गोकुल आवैं।दिन दस रहे सो भली कीनी अब जनि गहरु लगावैं॥तुम बिनु कछु न सुहाय प्रानपति कानन भवन न भावैं।बाल बिलख, मुख गौ न चरत तृन, बछरनि छीर न प्यावैं॥देखत अपनी आँखिन, ऊधो, हम कहि कहा जनावैं।सूर स्याम बिनु तपति रैन-दिनु हरिहि मिले सचु पावैं॥१८०॥

