राम चरन मनि भाये रे।अस ढरि जाहु राम के करहा, प्रेम प्रीतिल्यौ लाये रे॥ टेक॥आँब चढ़ी अँबली रे अँबली बबूर चढ़ी नगबेली रे।द्वै रथ चढ़ि गयौ राँड कौ करहा, मन पाटी की सैली रे॥कंकर कूई पतालि पनियाँ, सूनै बूँद बिकाई रे।बजर परौ इति मथुरा नगरी, काँन्ह पियासा जाई रे॥एक दहिड़िया दही जमायौ, दूसरी परि गई साई रे॥न्यूँति जिमाऊ अपनौ करहा छार मुनिस कौ डारी रे।इहि बँनि बाजै मदन भेरि रे, उहि बँनि बाजे तूरा रे।इहि बँनि खेले राही रुकमनि, उहिं बनि कान्हा अहीरा रे।आसि पासि तुरसी कौ बिरवा, माँहि द्वारिका गाँऊ रे।तहाँ मेरो ठाकुर राम राइ है, भगत कबीरा नाऊँ रे॥76॥

राम चरन मनि भाये रे
कबीरपद · लगभग २ मिनट