नगन फिरत जो पाइये जोग। बनका मिरग मुकति सब होग॥क्या नागे क्या बांधे चाम। जब नहिं चीन्हसि आतम राम॥मूँड़ मुडांए जो सि;ि पाई। मुक्ती भेड़ न गय्या काई॥बिंदु राख जो तरयै भाई। खुसरै क्यों न परम गति पाई॥कहु कबीर सुनहु नर भाई। राम नाम बिन किन गति पाई॥121॥

नगन फिरत जो पाइये जोग
कबीरपद · लगभग २ मिनट