सुत अवराध करल है जेते। जननी चीति न राखसि तेते॥रामज्या हौं बारिक तेरा। काहे न खंडसि अवगुन मेरा॥जे अति कोप करे करि धाया। ताभी चीत न राखसि माया॥चित्त भवन मन परो हमारा। नाम बिना कैसे उतरसि पारा॥देहि बिमल मति सदा सरीरा। सहजि सहजि गुन रवै कबीरा॥208॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सुन्न संध्या तेरी देव देवा करि अधपति आदि समाईकबीरकवितासुन्न संध्या तेरी देव देवा करि अधपति आदि समाईकबीर२ मिनट का पाठ