मेरी सूचीपढ़ना शुरू करें

भूलति हौ कत मीठी बातन

पद · लगभग २ मिनट

राग कान्हरो

भूलति हौ कत मीठी बातन।ये अलि हैं उनहीं के संगी, चंचल चित्त, साँवरे गातन॥वै मुरली धुनि कै जग मोहत, इनकी गुंज सुमन-मन-पातन।वै उठि आन आन मन रंजत, ये उड़ि अनत रंग-रस-रातन॥वै नवतनु मानिनि गृह-बासी, ये निसिदिवस रहत जलजातन।ये षटपद, वै द्विपद चतुर्भुज, इनमें नाहिं भेद कोउ भाँतन॥स्वारथ-निपुन सर्बरस भोगी जनि पतियाहु बिरह दुख-दातन।वै माधव, ये मधुप, सूर सुनि, इन दोउन कोऊ घटि घाट ना॥३३३॥

अब कुछ और पढ़ें