गृह तजि बन खंड जाइयै चुनि खाइयै कंदा।अजहु बिकार न छोड़ई पापी मन मंदा॥क्यौं छूटा कैसे तरौ भवनिधि जल भारी॥राखु राख मेरे बीठुला, जन सरनि तुमारी॥बिषम बिषय बासना तजिय न जाई॥अनिक यत्न करि राखियै फिरि लपटाई॥जरा जीवन जोबन गया कछु कीया नीका।इह जीया निर्मोल को कौड़ी लगि मीका॥कहु कबीर मेरे माधवा तू सर्वव्यापी॥तुम सम सरि नाहीं दयाल मो सम सरि पापी॥65॥

गृह तजि बन खंड जाइयै चुनि खाइयै कंदा
कबीरपद · लगभग २ मिनट