राग गौरी
ऊधो! क्यों राखौं ये नैन?सुमिरि सुमिरि गुन अधिक तपत हैं सुनत तिहारों बैन॥हैं जो मनोहर बदनचंद के सादर कुमुद चकोर।परम-तृषारत सजल स्यामघन के जो चातक मोर॥मधुप, मराल चरनपंकज के, गति-बिलास-जल मीन।चक्रबाक, मनिदुति दिनकर के, मृग मुरली आधीन॥सकल लोक सूनो लागतु है बिन देखे वा रूप।सूरदास प्रभु नँदनंदन के नखसिख अंग अनूप॥८८॥

